अदालत आदेश नहीं दे सकती कि व्यक्ति कितनी शराब पीए।
चेन्नई, तमिलनाडु: मद्रास हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी अदालत यह आदेश नहीं दे सकती कि कोई व्यक्ति कितनी मात्रा में शराब का सेवन कर सकता है। यह टिप्पणी एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज करते हुए की गई, जिसमें शराब की खपत को विनियमित करने की मांग की गई थी।
यह जनहित याचिका पूर्व AIADMK विधायक ए. द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि अत्यधिक शराब का सेवन समाज में कई समस्याओं को जन्म देता है और सरकार को इस पर नियंत्रण लगाना चाहिए। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस मामले में दखल देने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि शराब का सेवन व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला है, जब तक कि इससे दूसरों को नुकसान न हो या कानून का उल्लंघन न हो।
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी संकेत दिया कि शराब की बिक्री और खपत से संबंधित नीतियां बनाना विधायिका का काम है, न कि न्यायपालिका का। यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार और राज्य के नीति निर्माण के बीच की रेखा को स्पष्ट करता है। यह उन लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला है जो शराब पीने के व्यक्तिगत अधिकार के बारे में चिंतित हैं, जबकि समाज में शराब के दुरुपयोग के मुद्दे पर बहस जारी रहेगी।
