शराब नीति में बदलाव बना भ्रष्टाचार की जड़.

कोर्ट बयान से नीति निर्माण की मंशा पर सवाल

झारखंड की शराब नीति एक बार फिर विवादों में है। मुख्य गवाह के बयान ने नीति निर्माण की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। अदालत में दिए गए बयान में योजनाबद्ध बदलाव की बात कही गई है। छत्तीसगढ़ मॉडल को अपनाने का फैसला सामान्य नहीं बताया गया है। यह निर्णय कुछ खास लोगों के हित में लिया गया। प्रशासनिक प्रक्रिया की अनदेखी का आरोप है। नीति का उद्देश्य राजस्व नहीं बल्कि लाभ बताया गया है। इससे सरकारी छवि को नुकसान पहुंचा है। जनता के भरोसे पर भी असर पड़ा है। मामला नीति और नैतिकता दोनों से जुड़ गया है।

गवाह के अनुसार, उत्पाद विभाग की भूमिका निर्णायक रही। टेंडर प्रक्रिया को मनचाहे तरीके से बदला गया। कंसल्टेंसी नियुक्ति भी विवाद के घेरे में है। सीमित कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया। इससे प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई। नीति के तहत लाइसेंस वितरण में भी गड़बड़ी बताई गई है। सरकारी दुकानों का संचालन निजी नियंत्रण में चला गया। कर्मचारियों की नियुक्ति रणनीति का हिस्सा बनी। यह सब प्रशासनिक सहमति के बिना संभव नहीं था। नीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं।

वित्तीय लेनदेन ने इस नीति को और संदिग्ध बना दिया है। अवैध कमीशन की बात सामने आई है। टैक्स नियमों की अनदेखी का आरोप है। तकनीकी सेवाओं में भी पारदर्शिता नहीं रही। एक ही कंपनी को लाभ दिया गया। गवाह का बयान नीति सुधार की जरूरत दर्शाता है। जांच एजेंसियों के लिए यह अहम दस्तावेज है। भविष्य में शराब नीति पर पुनर्विचार की मांग उठ सकती है। प्रशासनिक जवाबदेही तय करना जरूरी हो गया है। यह मामला दूरगामी असर डाल सकता है।

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