सारंडा अभयारण्य पर आदेश लागू न करना नीति संकेत.
राज्य सरकार की रणनीति और कानूनी रास्ते पर सवाल.
सारंडा को अभयारण्य घोषित करने का मामला नीति स्तर पर अहम है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश स्पष्ट था। सरकार को समयबद्ध कार्रवाई करनी थी। लेकिन आदेश को सीधे लागू नहीं किया गया। सरकार ने पुनर्विचार याचिका दायर की। यह निर्णय विधानसभा में सामने आया। नीति और कानून के बीच संतुलन की बात उठी। विधायक ने सरकार से जवाब मांगा। सरकार ने आदेश पर असहमति जताई। इससे नीति बहस तेज हो गई।
पर्यावरण विभाग ने आदेश का पूरा विवरण रखा। 31468.25 हेक्टेयर क्षेत्र अधिसूचना में शामिल था। छह कम्पार्टमेंट बाहर रखने की अनुमति थी। खनन से जुड़े कारण बताए गए। अंतिम तिथि 12 फरवरी 2026 थी। अधिसूचना जारी नहीं हुई। सरकार ने इसे विचाराधीन बताया। याचिका की स्थिति स्पष्ट नहीं की गई। इससे पारदर्शिता पर सवाल उठे। नीति निर्णयों पर निगरानी बढ़ी है।
यह मामला वन नीति और खनन नीति को जोड़ता है। सरकार पर दोहरी जिम्मेदारी है। संरक्षण और विकास दोनों का संतुलन जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट का अगला फैसला दिशा तय करेगा। राज्य की पर्यावरण नीति प्रभावित होगी। प्रशासनिक देरी की आलोचना हो रही है। कानूनी प्रक्रिया लंबी हो सकती है। क्षेत्रीय जनता की चिंता भी जुड़ी है। सारंडा का भविष्य दांव पर है। यह मामला मिसाल बन सकता है।
