हाईकोर्ट ने बरकरार रखी निचली अदालत की सजा आदेश.
दोषियों की अपील खारिज, दो महीने में करना होगा आत्मसमर्पण.
रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने एक पुराने आपराधिक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने हत्या के प्रयास और लूट के मामले में दोषियों की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया है। अदालत ने कहा कि घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही भरोसेमंद है। इस गवाही को खारिज करने का कोई कारण नहीं मिला। अदालत ने कहा कि कानून में घायल गवाह की गवाही को विशेष महत्व दिया जाता है। उसके बयान में कोई गंभीर विरोधाभास नहीं पाया गया। मेडिकल रिपोर्ट भी उसी बयान का समर्थन करती है। इसलिए अभियोजन का मामला मजबूत माना गया। इसी आधार पर सजा को बरकरार रखा गया।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने दोषियों को लेकर निर्देश भी जारी किए। अदालत ने कहा कि दोनों आरोपी अभी जमानत पर हैं। इसलिए उनकी जमानत रद्द की जाती है। उन्हें दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करना होगा। इसके बाद उन्हें बाकी सजा काटनी होगी। अगर वे समय पर पेश नहीं होते हैं तो गिरफ्तारी की कार्रवाई होगी। यह फैसला न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने दिया। अदालत हरिहर ठाकुर और अर्जुन ठाकुर की अपील पर सुनवाई कर रही थी। दोनों ने सत्र न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी।
मामले की घटना 15 दिसंबर 2000 की शाम की बताई जाती है। उस दिन उमाकांत साह मोटरसाइकिल से घर लौट रहे थे। त्रिकोणी नदी के पास कुछ लोगों ने उन्हें रोक लिया। आरोप है कि अर्जुन ठाकुर ने पिस्तौल से गोली चलाई। गोली उनकी पीठ में लगी और पेट से निकल गई। इसके बाद चाकू से भी हमला किया गया। आरोपी उनकी मोटरसाइकिल लेकर फरार हो गए। घायल को पहले स्थानीय अस्पताल ले जाया गया। बाद में इलाज के लिए कोलकाता भेजा गया।
