तीन दशक पुराने हत्या केस में हाईकोर्ट ने दिया बड़ा निर्णय.
अपर्याप्त सबूतों के कारण दोषसिद्धि आदेश पूरी तरह रद्द किया.
रांची स्थित झारखंड हाईकोर्ट ने लंबे समय से लंबित हत्या मामले का निपटारा किया। अदालत ने तीन आरोपियों को दोषमुक्त घोषित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर सका। मामले में केवल एक गवाह की गवाही प्रमुख आधार थी। न्यायालय ने इसे पर्याप्त नहीं माना। खंडपीठ ने सभी साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन किया। अदालत ने न्यायिक मानकों का पालन करते हुए फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय ने आदेश दिया। निर्णय के बाद आरोपियों को कानूनी राहत मिली। यह फैसला न्याय प्रणाली में साक्ष्य की अहमियत दर्शाता है।
खंडपीठ ने फरवरी 1998 के फैसले को निरस्त कर दिया। दोषसिद्धि और सजा दोनों आदेश समाप्त कर दिए गए। अदालत ने कहा कि संदेह की स्थिति में आरोपी को लाभ मिलना चाहिए। आरोपियों को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया। जमानत बांड की बाध्यता भी समाप्त कर दी गई। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए मुकदमा समाप्त किया। फैसले में न्यायिक पारदर्शिता पर जोर दिया गया। न्यायालय ने कहा कि न्याय प्रमाणों पर आधारित होना चाहिए। इस निर्णय को महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। लंबे समय से चल रहा विवाद समाप्त हो गया।
यह मामला 23 जनवरी 1996 की हत्या घटना से संबंधित था। सोनाहातु क्षेत्र में बिशंभर सिंह मुंडा की हत्या हुई थी। धारदार हथियारों से हमला कर हत्या की गई थी। अभियोजन ने जमीन विवाद को कारण बताया था। निचली अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराया था। उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। मामला वर्षों तक उच्च न्यायालय में लंबित रहा। हाईकोर्ट ने साक्ष्य की कमजोरी को निर्णायक माना। अदालत ने कहा कि न्याय संदेह से ऊपर होना चाहिए। फैसले के साथ पुराना केस पूरी तरह समाप्त हो गया।
