जीएसटी लाभ देने में देरी पर हाईकोर्ट ने सरकार को घेरा.
नए उद्योगों के मामलों में कमेटी की कार्यशैली पर उठे सवाल.
झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में नए उद्योगों को जीएसटी लाभ देने में हो रही देरी को गंभीर माना है। अदालत ने हाई पावर्ड कमेटी की कार्यशैली पर सवाल उठाये हैं। कोर्ट ने कहा कि इंडस्ट्रियल पॉलिसी के तहत उद्योगों को उनका अधिकार समय पर मिलना चाहिए। चीफ जस्टिस एम एस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि उद्योगों के क्लेम पर जल्द निर्णय लेना जरूरी है। कोर्ट ने कमेटी को 30 दिनों का अतिरिक्त समय दिया है। मुख्य सचिव को स्वयं अनुपालन शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह जिम्मेदारी किसी अन्य अधिकारी को नहीं सौंपी जा सकती। उद्योगों की ओर से अधिवक्ता सुमित गड़ोदिया ने पक्ष रखा। मामले की अगली सुनवाई 16 जून 2026 को होगी।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि मामलों की जांच के लिए उद्योग निदेशालय की मदद ली गई है। इस पर अदालत ने नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि हाई पावर्ड कमेटी स्वयं निर्णय लेने के बजाय जिम्मेदारी टाल रही है। अदालत ने कहा कि पहले भी आदेश दिये गये थे लेकिन उनका पालन नहीं हुआ। कोर्ट ने समयसीमा के भीतर कार्रवाई नहीं होने पर चिंता जतायी। अदालत ने कहा कि अतिरिक्त दस्तावेज मांगने में भी काफी देर की गई। इससे आदेश अनुपालन में बाधा उत्पन्न हुई। कोर्ट ने इस रवैये को अस्वीकार्य बताया। अदालत ने कहा कि उद्योगों को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि कमेटी के सदस्यों के खिलाफ व्यक्तिगत कार्रवाई की जा सकती है। मामले में कई कंपनियों की याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इनमें नरसिंह इस्पात लिमिटेड और माल मेटालिक्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं। राज्य सरकार की नीति के अनुसार उद्योगों को जीएसटी राशि का 75 प्रतिशत वापस किया जाना है। अदालत ने कहा कि पूर्व के आदेशों के बावजूद कमेटी निष्क्रिय रही। न तो समय पर निर्णय लिया गया और न ही अनुपालन रिपोर्ट दी गई। कोर्ट ने इसे प्रशासनिक उदासीनता बताया है।
